कुछ दूऱ तु कहाँ चली, इस
घर से
अनजानी बनी,
इस दरिये को दे दुहाई, जैसे सागर से सरिता चली |……….
वो बचपन के देख खिलौने,
कही कोने में पडे है,
जैसे कोई बच्चे से माँ, नाराज होकर चली |..........
वो आँगन का दीयाँ, अब रौशनी भी देता नहीं,
महोताज था वो तेरे नूर का, उसे बेनूर कर चली |……..
वो मस्ती भरी बाते, वो तेरी झूठी कहानियाँ,
कुछ पल की हँसी भी, उधार दे चली |……..
वो आँगन की रंगोली, तेरे रंग पहनकर घूमती थी।
वो रंगीन दुनिया भी, संग अपने ले चली |……..
वो प्यार पिता का, वो माँ का आँचल भी,
छोटे भाई-बहन को, यूँ मजधार छोड चली |……..
वो चहकती दुनिया भी, कुछ पल में सूमसाम हो गई,
जैसे तीरथ से ईश्वर की हस्ती चली।......
−बादल पंचाल
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