Wednesday, 24 June 2015

सागर से सरिता चली...




कुछ दूऱ तु कहाँ चली, इस घर से अनजानी बनी,
इस दरिये को दे दुहाई, जैसे सागर से सरिता चली |……….

वो बचपन के देख खिलौने, कही कोने में पडे है,
जैसे कोई बच्चे से माँ, नाराज होकर चली |..........

वो आँगन का दीयाँ, अब रौशनी भी देता नहीं,
महोताज था वो तेरे नूर का, उसे बेनूर कर चली |……..

वो मस्ती भरी बाते, वो तेरी झूठी कहानियाँ,
कुछ पल की हँसी भी, उधार दे चली |……..

वो आँगन की रंगोली, तेरे रंग पहनकर घूमती थी।
वो रंगीन दुनिया भी, संग अपने ले चली |……..

वो प्यार पिता का, वो माँ का आँचल भी,
छोटे भाई-बहन को, यूँ  मजधार छोड चली |……..

वो चहकती दुनिया भी, कुछ पल में सूमसाम हो गई,
जैसे तीरथ से ईश्वर की हस्ती चली।......                                                      −बादल पंचाल

No comments:

Post a Comment